बुधवार, 22 अप्रैल 2015

ईश्वर कौन है? कहाँ है? कैसा है?- by Pt. Shri Ram Sharma Acharya

ईश्वर विश्वास पर ही मानव प्रगति का इतिहास टिका हुआ है । जब यह डगमगा जाता है तो व्यक्ति इधर-उधर हाथ पाँव फेंकता विक्षुब्द मनः स्थिति को प्राप्त होता दिखाई देता है । ईश्वर चेतना की वह शक्ति है जो ब्रह्माण्ड के भीतर और बाहर जो कुछ है, उस सब में संव्याप्त है । उसके अगणित क्रिया कलाप हैं जिनमें एक कार्य इस प्रकृति का-विश्व व्यवस्था का संचालन भी है । संचालक होते हुए भी वह दिखाई नहीं देता क्योंकि वह सर्वव्यापी सर्वनियन्ता है । इसी गुत्थी के कारण कि वह दिखाई क्यों नहीं देता, एक प्रश्न साधारण मानव के मन में उठता है- ईश्वर कौन है, कहाँ है, कैसा है ?
परम पूज्य गुरुदेव ने मानवी अस्तित्व से जुड़े इस सबसे अहम् प्रश्न, जो आस्तिकता की धुरी भी है, का जवाब देते हुए वाङ्मय के इस खण्ड में विज्ञान व शास्त्रों की कसौटी पर ईश्वर के अस्तित्व को प्रमाणित किया है । मात्र स्रष्टि संचालन ही ईश्वर का काम नहीं है चूंकि हमारा संबंध उसके साथ इसी सीमा तक है, अपनी मान्यता यही है कि वह इसी क्रिया-प्रक्रिया में निरत रहता होगा, अतः उसे दिखाई भी देना चाहिए । मनुष्य की यह आकांक्षा एक बाल कौतुक ही कही जानी चाहिए क्योंकि अचिन्त्य, अगोचर, अगम्य परमात्मा-पर ब्रह्म-ब्राह्मी चेतना के रूप में अपने ऐश्वर्यशाली रूप में सारे ब्रह्माण्ड में, इको सिस्टम के कण-कण में संव्याप्त है ।

ईश्वर कैसा है व कौन है, यह जानने के लिए हमें उसे सबसे पहले आत्मविश्वास-सुदृढ़ आत्म-बल के रूप में अपने भीतर ही खोजना होगा । परमपूज्य गुरुदेव का ईश्वर सद्गुणों का-सत्प्रवृत्तियों का-श्रेष्ठताओं का समुच्चय है जो अपने अन्दर जिस परिमाण में जितना इन सद्गुणों को उतारता चला जाता है, वह उतना ही ईश्वरत्व से अभपूरति होता चला जाता है । ईश्वर तत्व की-आस्तिकता की यह परिभाषा अपने आप में अनूठी है एवं पूज्यवर की ही अपनी ऋषि प्रणीत शैली में लिखी गयी है । उनकी लालित्यपूर्ण भाषा में ईश्वर ''रसो वैसैः'' के रूप में भी विद्यमान है तथा वेदान्त के तत्त्वमसि, अयमात्मा ब्रह्म के रूप में भी । वयक्तित्व के स्तर को ''जीवो ब्रह्मैव नापरः'' की उक्ति के अनुसार परिष्कात कर परमहंस-स्थित प्रज्ञ की स्थिति प्राप्त कर आत्म साक्षात्कार कर लेना ही पूज्यवर के अनुसार ईश्वर दर्शन है-आत्म साक्षात्कार है-जीवन्मुक्त स्थिति है ।

एक जटिल तत्त्व दर्शन जिसमें नास्तिकता का प्रतिपादन करने वाले एक-एक तथ्य की काट की गयी है, को कैसे सरस बनाकर व्यक्ति को आस्तिकता मानने पर विवश कर दिया जाय, यह विज्ञ जन वाङ्मय के इस खण्ड को पढ़कर अनुभव कर सकते हैं । ईश्वर के संबंध में भ्रान्तियाँ भी कम नहीं हैं । बालबुद्धि के लोग कशाय कल्मशों को धोकर साधना के राज-मार्ग पर चलने को एक झंझट मानकर सस्ती पगडण्डी का मार्ग खोजते हैं । उन्हें वही शार्टकट पंसद आता है । वे सोचते हैं कि दृष्टिकोण को घटिया बनाए रखकर भी थोड़ा बहुत पूजा उपचार करके ईश्वर को प्रसन्न भी किया जा सकता है व ईश्वर विश्वास का दिखावा भी । जब कि ऐसा नहीं है । परमपूज्य गुरुदेव उपासना, साधना, आराधना की त्रिविध राह पर चल कर ही ईश्वर दर्शन संभव है यह समझाते हैं व तत्त्व-दर्शन के साथ-साथ व्यावहारिक समाधान भी देते हैं ।

ईश्वर कौन है, कैसा है-यह जान लेने पर, वह भी रोजमर्रा के उदाहरणों से विज्ञान सम्मत शैली द्वारा समझ लेने पर किसी को भी कोई संशय नहीं रह जाता कि आस्तिकता का तत्त्व दर्शन ही सही है । चार्वाकवादी नास्तिकता परक मान्यताएँ नहीं । यह इसलिए भी जरूरी है कि ईश्वर विश्वास यदि धरती पर नहीं होगा तो समाज में अनीति मूलक मान्यताओं, वर्जनाओं को लांघकर किये गए दुष्कर्म का ही बाहुल्य चारों ओर होगा, कर्मफल से फिर कोई डरेगा नहीं और चारों ओर नरपशु, नरकीटकों का या '' जिसकी लाठी उसकी भैंस का'' शासन नजर आएगा । अपने कर्मों के प्रति व्यक्ति सजग रहे, इसीलिए ईश्वर विश्वास जरूरी है । कर्मों के फल को उसी को अर्पण कर उसी के निमित्त मनुष्य कार्य करता रहे, यही ईश्वर की इच्छा है जो गीताकार ने भी समझाई है ।

ईश्वर शब्द बड़ा अभव्यंजनात्मक है । सारी स्रष्टिमें जिसका एश्वर्य छाया पड़ा हो, चारों ओर जिसका सौंदर्य दिखाई देता हो-स्रष्टिके हर कण में उसकी झाँकी देखी जा सकती हो, वह कितना ऐश्वर्यशाली होगा इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती । इसीलिए उसे अचिन्त्य बताया गया है । इस सृष्टि में यदि हर वस्तु का कोई निमित्त कारण है-कर्त्ता है, तो वह ईश्वर है । वह बाजीगर की तरह अपनी सारी कठपुतलियों को नचाया करता है व ऊपर से बैठकर तमाशा देखता रहता है । यही पर ब्रह्म-ब्राह्मी चेतना जिसे हर श्वांस में हर कार्य में, हर पल अनुभव किया जा सकता है-सही अर्थों में ईश्वर है । प्राणों के समुच्चय को जिस प्रकार महाप्राण कहते हैं, ऐसे ही आत्माओं के समुच्चय को-सर्वोच्च सर्वोत्काष्टरूप को-हम सब के परमपिता को परमात्मा कहते हैं, ईश्वर के संबंध में एक गूढ़ विवेचन का सरल सुबोध प्रतिपादन हर पाठक-परिजन को संतुष्टकर उसे सही अर्थों में आस्तिक बनाएगा, ऐसा हमारा विश्वास है॥

What Actually You want What Actually You DO?

aaj mujhe gurudev ka sach me ehsaas huwa ki mai bhi kuch kar sakti hu. Jab bhi main udaas hui guru ne apna sahara diya kaise bhi wo mujh tak khud pahuch jaate. Aap ne  sach me mujhe meri jindagi di hai ab na koi rok sakega na koi soch sakega yeh duniya ke jhamele hai jo ki har pal mera rast rokte rhate hai. baar baar meri antratmamujhe pukar rahi hai ki mujhe kuch karna chahiye kuch to karna chahiye main yun hi apni jindagi ko nahi jaya karungy kuch to hai ya to use mera intutuion kah lo ya to meri destiny(prarabdh) kah lo jo baar baar mujhe prerit karti hai aur kahti hai

"kuch kam karo kuch kaam karo jag me rah kuch naam karo" wo na jaane kon si chees hai jo mujhe rasta deti rehti hai shyad main apne aap ko jaan nahi paa rahi hu shayaad mai soch hi nahi paa rai hu ki mujhe meri jindagi se kya chahiye.

What my thought that human must think about their inner nature what actually they want and what actually they do at present? life is very  precious and every second is very important if you want to do some extra work you need to save your time without wasting too much time on any unnecessary work.

Perhaps My intuition says to me write write and write as much as possible. And every human being has different 2 quality which comes with their birth. So try to think rethink and rethink about yourself. You can try it in peaceful place or in night when no body is disturbing you. Rethink about yourself. Than you might get Answer.

Thanks
Niharika


बुधवार, 15 अप्रैल 2015

गहना कर्मणोगतिः


आप सरल मार्ग को अपनाइए, लड़ने, बड़बड़ाने और कुढ़ने की नीति छोड़कर दान, सुधार, स्नेह के मार्ग का अवलम्बन लीजिए। एक आचार्य का कहना है कि ‘‘प्रेम भरी बात, कठोर लात से बढ़कर है।’’ हर एक मनुष्य अपने अंदर कम या अधिक अंशों में सात्विकता को धारण किए रहता है। आप अपनी सात्विकता को स्पर्श करिए और उसकी सुप्तता में जागरण उत्पन्न कीजिए। जिस व्यक्ति में जितने सात्विक अंश हैं, उन्हें समझिए और उसी के अनुसार उन्हें बढ़ाने का प्रयत्न कीजिए। अंधेरे से मत लड़िए वरन् प्रकाश फैलाइए, अधर्म बढ़ता हुआ दीखता हो, तो निराश मत हूजिए वरन् धर्म प्रचार का प्रयत्न कीजिए। बुराई को मिटाने का यही एक तरीका है कि अच्छाई को बढ़ाया जाय। आप चाहते हैं कि इस बोतल से हवा निकल जाय, तो उसमें पानी भर दीजिए। बोतल में से हवा निकालना चाहें पर उसके स्थान पर कुछ भरें नहीं तो आपका प्रयत्न बेकार जाएगा। एक बार हवा को निकाल देंगे, दूसरी बार फिर भर जाएगी। गाड़ी जिस स्थान पर खड़ी हुई है, वहाँ खड़ी रहना पसंद नहीं करते, तो उसे खींच कर आगे बढ़ा दीजिए, आपकी इच्छा पूरी हो जाएगी। आप गाड़ी को हटाना चाहें, पर उसे आगे बढ़ाना पसंद न करें, इतना मात्र संतोष कर लें कि कुछ क्षण के लिए पहियों को ऊपर उठाए रहेंगे, उतनी देर तो स्थान खाली रहेगा, पर जैसे ही उसे छोड़ेंगे, वैसे ही वह जगह फिर घिर जाएगी। संसार में जो दोष आपको दिखाई पड़ते हैं, उनको मिटाना चाहते हैं तो उनके विरोधी गुणों को फैला दीजिए। आप गंदगी बटोरने का काम क्यों पसंद करें? उसे दूसरों के लिए छोड़िए। आप तो इत्र छिड़कने के काम को ग्रहण कीजिए। समाज में मरे हुए पशुओं के चमड़े उधेड़ने की भी जरूरत है पर आप तो प्रोफेसर बनना पसंद कीजिए। ऐसी चिंता न कीजिए कि मैं चमड़ा न उधेडूँगा तो कौन उधेड़ेगा? विश्वास रखिए, प्रकृति के साम्राज्य में उस तरह के भी अनेक प्राणी मौजूद हैं। अपराधियों को दण्ड देने वाले स्वभावतः आवश्यकता से अधिक हैं। बालक किसी को छेड़ेगा तो उसके गाल पर चपत रखने वाले साथी मौजूद हैं, पर ऐसे साथी कहाँ मिलेंगे, जो उसे मुफ्त दूध पिलाएँ और कपड़े पहनाएँ। आप चपत रखने का काम दूसरों को करने दीजिए। लात का जवाब घूँसों से देने में प्रकृति बड़ी चतुर है। आप तो उस माता का पवित्र आसन ग्रहण कीजिए, जो बालक को अपनी छाती का रस निकाल कर पिलाती है और खुद ठंड में सिकुड़ कर बच्चे को शीत से बचाती है। आप को जो उच्च दार्शनिक ज्ञान प्राप्त हुआ है, इसे विद्वान, प्रोफेसर की भाँति पाठशाला के छोटे-छोटे छात्रों में बाँट दीजिए।
पं श्रीराम शर्मा आचार्य 

शनिवार, 11 अप्रैल 2015

विचार शक्ति

विचार शक्ति इस विश्व कि सबसे बड़ी शक्ति है | उसी ने मनुष्य के द्वारा इस उबड़-खाबड़ दुनिया को चित्रशाला जैसी सुसज्जित और प्रयोगशाला जैसी सुनियोजित बनाया है | उत्थान-पतन की अधिष्ठात्री भी तो वही है | वस्तुस्तिथि को समझते हुऐ इन दिनों करने योग्य एक ही काम है " जन मानस का परिष्कार " | -युगऋषि वेदमूर्ति तपोनिष्ठ पं. श्रीराम शर्मा आचार्य 

जीवनक्रम बदलिए

मित्रो, यह सच्चाई नहीं है। आप भगवान् के बड़े बेटे हैं। आप उनके बेटे हैं, जो बड़ा उदार, दयालु, कृपा का सागर तथा सर्वसम्पन्न है। भगवान् अपने लिए क्या चाहता है? क्या खाता है? वह केवल दूसरों के लिए जिन्दा रहता है, आपको यह सोचना चाहिए तथा अपना जीवनक्रम बदलने का प्रयास करना चाहिए। आप तो केवल लक्ष्मी का मंत्र सीखना चाहते हैं। आप कहते हैं कि गुरुजी यह क्या कह रहे हैं? मित्रो, आप चौरासी लाख योनियों का शरीर देखिये। आप अच्छे कर्म नहीं करेंगे, तो आपको गधे की योनि स्वीकार करनी पड़ेगी। आप पर ईंट लादी जाएँगी। वजन के मारे पीछे का पैर जख्मी हो जाएगा। पैर लड़खड़ाने लगेंगे। आप कहेंगे क आचार्य जी हम तो मन्नूलाल सेठ हैं। हम इस योनि में कैसे जाएँगे? आपने अच्छा कर्म नहीं किया, तो आपको घुसना ही होगा।
           मित्रो! आपको अपनी मूर्खता पर विचार करना चाहिए। आप बेकार की समस्याओं- बेसिर की समस्याओं में उलझे हैं। आपका दिमाग इस उलझन में पड़ा रहता है। आपका जीवन बर्बाद हो रहा है और आप चुप बैठे रहते हैं। हम आपको धन्यवाद देने वाले थे, परन्तु अब नहीं देना चाहते। आपको अभी १२५ रुपये मिल रहे थे, पर आप ३५० रुपये की नौकरी चाहते हैं। यह बेकार की बातें हैं। आपको जब १२५ रुपये खर्च करना नहीं आता, तो ३५० रुपये कैसे खर्च करेंगे। बेकार की बातें बन्द कीजिए। अगर आप आचार्य जी का आशीर्वाद ले जाते तथा अपने जीवन को महान बना लेते, तो हम और आप दोनों धन्य हो जाते।
By-Pt. Shri Ram Sharma Acharya

गुरुवार, 9 अप्रैल 2015

"Larger family" concept By Gurudev

We are here to discuss larger family concept given by Gurudev. Today people want to live in single family and do not want interference of parents in their life. Single family has comparatively less benefit rather than more loss. In single family husband and wife is responsible for taking care of child, So it become more tensed when both parent are professional working. In that condition parents has to left their child in child care center which is mostly available in metros, but not available in small cities and town. This is the major loss which has to bear our Indian single family.
So today's generation  need to rethink about the constituted or joined family. We have to learn to live  with our friends, family, neighbors with accepting their behaviors. This is necessary for our children mental ability and social behavior development. This is not a tough task if we rethink about this. We must live with different-2 people with accepting their different views, religion, and beliefs toward life. That will make sense of Unity and Vasudhaiv Kutumbakam.
Here larger family doesn't meant to Old type of Joint family where Parents enforce their children to follow rules and regulation whether it is right or wrong, and without caring of their child emotions..

Whether this Modern larger family concept says that Parents need to adjust their views and thoughts according to their children and has to accept it easily so that new generation does not feel uneasy to show their views and concept in front of them. Parents has to listen  them and give opportunity to speak, and can show their emotions  in front of them. This will make a bonding of confidence between them that will become more stronger.

मंगलवार, 7 अप्रैल 2015

"Main kya hoon" by Shir Ram Sharma Acharya

    इस संसार में जानने योग्य अनेक बातें हैं । विद्या के अनेकों सूत्र हैं, खोज के लिए, जानकारी प्राप्त करने के लिए अमित मार्ग हैं। अनेकों विज्ञान ऐसे हैं जिनकी बहुत कुछ जानकारी प्राप्त करना मनुष्य की स्वाभाविक वृत्ति है। क्यों? कैसे? कहाँ? कब? के प्रश्न हर क्षेत्र में वह फेंकता है। इस जिज्ञासा भाव के कारण ही मनुष्य अब तक इतना ज्ञान सम्पन्न और साधन सम्पन्न बना है। सचमुच ज्ञान ही जीवन का प्रकाश स्तम्भ है।

    जानकारी की अनेकों वस्तुओं में से "अपने आपकी जानकारी" सर्वोपरि है। हम बाहरी अनेक बातों को जानते हैं या जानने का प्रयत्न करते हैं पर यह भूल जाते हैं कि हम स्वयं क्या हैं? अपने आपका ज्ञान प्राप्त किए बिना जीवन का क्रम बड़ा डाँवाडोल, अनिश्चित और कंटकाकीर्ण हो जाता है। अपने वास्तविक स्वरूप की जानकारी न होने के कारण मनुष्य न सोचने लायक बातें सोचता है और न करने लायक कार्य करता है। सच्ची सुख शान्ति का राजमार्ग एक ही है और वह है-"आत्म ज्ञान"। इस पुस्तक में आत्म ज्ञान की शिक्षा है। "मैं क्या हूँ?" इस प्रश्न का उत्तर शब्दों द्वारा नहीं वरन् साधना द्वारा हृदयंगम कराने का प्रयत्न इस पुस्तक में किया गया है। यह पुस्तक अध्यात्म मार्ग के पथिकों का उपयोगी पथ प्रदर्शन करेगी, ऐसी हमें आशा है।
 कः कालः कानि मित्राणिको देशः कौ व्ययाऽऽ गमौ 
    
कश्चाहं का  मे शक्तिरितिचिन्त्यं मुहुर्मुह॥-चाणक्य नीति || ४.१८ 


            ''
कौन सा समय हैमेरे मित्र कौन हैंशत्रु कौन हैंकौन सा देश (स्थानहै,मेरी आय-व्यय क्या हैमैं कौन हूँमेरी शक्ति कितनी हैइत्यादि बातों का बराबर विचारकरते रहो'' सभी विचारकों ने ज्ञान का एक ही स्वरूप बताया हैवह है ''आत्म-बोध''अपने सम्बन्ध में पूरी जानकारी प्राप्त कर लेने के बाद कुछ जानना शेष नहीं रह जाताजीव असल में ईश्वर ही है विचारों से बँधकर वह बुरे रूप में दिखाई देता हैपरन्तु उसकेभीतर अमूल्य निधि भरी हुई है शक्ति का वह केन्द्र है और इतना है जिसकी हम कल्पनाभी नहीं कर सकते सारी कठिनाईयाँसारे दुःख इसी बात के हैं कि हम अपने को नहींजानते जब आत्म स्वरूप को समझ जाते हैंतब किसी प्रकार का कोई कष्ट नहीं रहता
 आत्म स्वरूप का अनुभव करने पर वह कहता है-
नाहं जातो जन्म मृत्यु कुतो मेनाहं प्राणः क्षुस्मिपासे कुतो मे 
नाहं चित्तं शोक मोहौ कुतो मेनाहं कर्ता बंध मोक्षौ कुतो मे॥ 
            
मैं उत्पन्न नहीं हुआ हूँफिर मेरा जन्म-मृत्यु कैसेमैं प्राण नहीं हूँफिरभूख-प्यास मुझे कैसीमैं चित्त नहीं हूँफिर मुझे शोक-मोह कैसेमैं कर्ता नहीं हूँफिरमेरा बन्ध-मोक्ष कैसे?
            
जब वह समझ जाता है कि मैं क्या हूँ तब उसे वास्तविक ज्ञान हो जाता हैऔर सब पदार्थों का रूप ठीक से देखकर उसका उचित उपयोग कर सकता है चाहे किसीदृष्टि से देखा जाय आत्मज्ञान ही सर्वसुलभ और सर्वोच्च ठहरता है
             किसी व्यक्ति से पूछा जाय कि आप कौन हैंतो वह अपने वर्णकुल,व्यवसायपद या सम्प्रदाय का परिचय देगा ब्राह्मण हूँअग्रवाल हूँबजाज हूँतहसीलदारहूँवैष्णव हूँ आदि उत्तर होंगे अधिक पूछने पर अपने निवास स्थानवंश व्यवसाय आदिका अधिकाधिक विस्तृत परिचय देगा प्रश्न के उत्तर के लिए ही यह सब वर्णन हों सोनहींउत्तर देने वाला यथार्थ में अपने को वैसा ही मानता है शरीर-भाव में मनुष्य इतनातल्लीन हो गया है कि अपने आपको वह शरीर ही समझने लगा है 
            
वंशवर्णव्यवसाय या पद शरीर का होता है शरीर मनुष्य का एक परिधान,औजार है परन्तु भ्रम और अज्ञान के कारण मनुष्य अपने आपको शरीर ही मान बैठता हैऔर शरीर के स्वार्थ तथा अपने स्वार्थ को एक कर लेता है इसी गड़बड़ी में जीवन अनेकअशान्तियोंचिन्ताओं और व्यथाओं का घर बन जाता है
 

सोमवार, 6 अप्रैल 2015

मन जीता तो जग जीता


मन बड़ा बलवान् शत्रु है। इससे युद्ध करना भी अत्यंत दुष्कर कृत्य है। इससे युद्ध में एक विचित्रता है। यदि युद्ध करने वाला दृढ़ता से युद्ध में संलग्न रहे, निज इच्छाशक्ति को मन के व्यापारों पर लगाए रहे, तो युद्ध में संलग्न सैनिक की शक्ति अधिकाधिक बढ़ती है और एक दिन वह इस पर पूर्ण विजय प्राप्त कर लेता है।
मन को दृढ़ निश्चय पर स्थिर रखने से मुमुक्षु की इच्छा-शक्ति प्रबल होती है। मन का स्वभाव मनुष्य के अनुकूल बन जाने का है। उसे कार्य दीजिए। वह चुपचाप नहीं बैठना चाहता। यदि तुम उसे फूल-फूल पर विचरण करने वाली तितली बना दोगे, तो यह तुम्हें न जाने कहाँ-कहाँ की खाक छनवाएगा। यदि तुम इसे उजड्ड रखोगे, तो यह रात-दिन भटकता ही रहेगा, पर यदि तुम इसे चिंतन योग्य पदार्थों में स्थिर रखने का प्रयत्न करोगे, तो यह तुम्हारा सबसे बड़ा मित्र बन जाएगा।
जब-जब तुम्हारे अंत:करण में वासना का प्रबल वेग उत्पन्न हो, निश्चयात्मक बुद्धि को बुद्धि  करो। मन में थोड़ी देर के निमित्त पृथक् होकर इसके व्यापारों पर तीव्र दृष्टि रखो। बस, विचार-शृंखला टूट जाएगी और तुम इसके साथ चलायमान न होगे। मन के व्यापार के साथ निजि आत्मा की समस्वरता न होने दो। इसी अभ्यास द्वारा यह आज्ञा देने वाला न रह कर सीधा-आज्ञाकारी अनुचर बन जाएगा।
-अखण्ड ज्योति-मार्च 1945 पृष्ठ 16

Gayatri Mahavidya

आज का सबसे बड़ा संकट है आत्मबल की कमी, मानव की अशक्ति ।। आस्था संकट से पीड़ित मानव जाति को जिस संजीवनी- जीवन मन्त्र की आवश्यकता है, वह गायत्री महामंत्र के रूप में विद्यमान है ।। यदि व्यक्ति इस मंत्र की उपासना के माध्यम से अपना ब्रह्मवर्चस् जगा ले, अपने प्रसुप्त बल को पुनः प्राप्त कर ले तो वह समस्त प्रतिकूलताओं से मोर्चा ले सकता है ।। श्रद्धा, निष्ठा, प्रज्ञारूपी त्रिपदा गायत्री की उपासना साधक को ऐसा ही आत्मबल प्रदान करती है, जिससे वह दुर्भावनाओं, दुश्चिन्तन दुष्प्रवृत्तियों से जूझते हुए जीवन समर जीतता हुआ आगे बढ़ता रहा सकता है ।। अपना आध्यात्मिक स्वास्थ्य बनाए रख अपना आभा मण्डल सतत बढ़ाए रखता चल सकता है ।।

अपना सुधार संसार की सबसे बड़ी सेवा

विश्वव्यापी समस्त दु:खों का कारण है -अज्ञान और पाप, स्वार्थ और मोह, तृष्णा और वासना। इन महाव्याधियों को हटाए बिना दु:खों को दूर करने के समस्त प्रयत्न ऐसे हैं जैसे रक्त -विकार की फुंसियों पर मरहम लगाना। इससे व्याधि का समाधान नहीं होता। तात्कालिक कष्टों से तथा सामयिक अभावों से पीड़ित मनुष्यों की सहायता करना कर्त्तव्य है, पर उतने मात्र से न तो मानव जाति के कष्ट दूर हो सकते हैं और न समस्याएँ सुलझ सकती हैं।
धन देकर हुई सेवा सबसे साधारण मानी जाती है। उससे मनुष्यों की कुछ समस्याएँ थोड़ी देर के लिए सरल होती हैं। किसी को शरीर - सुख पहुँचाकर की हुई सेवा भी कुछ समय तक ही दु:ख दूर करती है। तन और मन की सेवा नहीं करनी चाहिए, यह प्रयोजन नहीं है, वह तो उदार हृदय व्यक्ति समय-समय पर करता ही रहेगा, उन्हें तो करनी ही चाहिए, पर किसी का जीवनक्रम जब तक न सुधरेगा तब तक इन तन और धन की सहायताओं से भी उसका काम न चलेगा। आज जो सर्वत्र अशांति, क्लेश और पीड़ा का साम्राज्य छाया हुआ है उसका कारण धन या तन के सुखों की कमी नहीं है। यह तो समयानुसार दिन-दिन बढ़ते ही जाते हैं फिर भी जो क्लेश बढ़ रहे हैं उनका कारण व्यक्ति और समाज का आंतरिक स्तर, चरित्र एवं आदर्श का गिर जाना ही है। इसे उठाने की जो सेवा है उसी से विश्वव्यापी समस्याएँ सुलझेंगी अन्यथा कुआँ बनवाने या प्याऊ लगाने से, दवाखाने और धर्मशाला बनवाने से भी क्या काम चलने वाला है। जब लोगों का चरित्र चोरी, बेईमानी, झूठ, दगाबाजी, लूट ,शोषण, अपहरण, विलासिता, फिजूलखर्ची, व्यसन, व्यभिचार आदि अनैतिक दशाओं में और तेजी से अग्रसर हो रहा है तो इन कुकृत्यों से जो दुष्परिणाम और दु:ख उत्पन्न होंगे, उन्हें देखते हुए प्याऊ लगवाने, गौ को चारा बूँद पानी डालने के समान ही होगा।
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अपना सुधार संसार की सबसे बड़ी सेवा पृष्ठ 20

शुक्रवार, 3 अप्रैल 2015

Do work yourself.

 Today housewives  don't want to work household work themselves. The woman who does her household work herself is look like a misery person in our Indian society. 
Doing household work self is not a bad thing if we think like that the household work is an exercise of our body...but a  lady don't want to understand these things. Its a prestige issue for her.

Success behind unsuccess

The unsuccessful people always talk about success, aim and ambition. But the successful man more intend toward their work style, plan and positive attitude to find out the way of success, They work in the perfect manner so that success comes behind them.

The person who want success in his work must know about his strength and weakness. Suppose a person want to become an engineer than he must have proper knowledge of mathematics and physics,than he can crack competitive exams of engineering. So first we decide our aim on the basis of our calibre and our strong and weak points. 

How to overcome depression

Depression is a silent dangerous disease which spread like cancer, We must need to win over this disease by the help of busyness in work. The person who don't have time to think about past AND  FUTURE and he lives in present is the happiest man in the world.

We should follow the concept "Byast raho mast raho".

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Om namo hiranya behave ॐ नमो हिरण्यबाहवे hiranya varnaya हिरण्य वर्णाये hiranya roopaya हिरण्यरूपाये hiranya pataye हिरण्ये...