प्रारब्ध कर्मों का, भूतकाल में किए हुए भले बुरे कर्मों का फल मिलना प्रायः निश्चित ही होता है। कई बार तो ऐसा होता है कि कृतकार्य का फल तुरंत मिल जाता है, कई बार ऐसा होता है कि प्रारब्ध भोगों की प्रबलता होने के कारण विधिनिर्धारित भली–बुरी परिस्थिति वर्तमान काल में बनी रहती है और इस समय जो कार्य किए गए हैं, उनका परिणाम कभी आगे भुगतने के लिए जमा हो जाता है।
स्मरण रखिए, वर्तमान ही प्रधान है। पिछले जीवन में आप भले या बुरे कैसे भी काम करते रहे हों, यदि अब अच्छे काम करते हैं तो चंद भाग्य बन गए फलों को छोड़कर अन्य संचित पाप हतवीर्य हो जाएँगे और यदि उनका कुछ परिणाम हुआ भी तो बहुत ही साधारण, स्वल्प कष्ट देने वाला एवं कीर्ति बढ़ाने वाला होगा। शिवि, दधीचि, हरिश्चंद्र, प्रह्लाद, ध्रुव, पांडव आदि को पूर्व भोगों के अनुसार कष्ट सहने पड़े, पर वे कष्ट अंततः उनकी कीर्ति को बढ़ाने वाले और आत्मलाभ कराने वाले सिद्ध हुए। सुकर्मी व्यक्तियों के बड़े–बड़े पूर्वपातक स्वल्प दुःख देकर सरल रीति से भुगत जाते हैं, पर जो वर्तमान काल में कुमार्गगामी हैं, उनके पूर्वकृत सुकर्म तो हतवीर्य हो जाएँगे। जो संचित पाप कर्म हैं, वे सिंचित होकर परिपुष्ट और पल्ल्वित होंगे, जिससे दुःखदायी पाप फलों की श्रृंखला अधिकाधिक भयंकर होती जाएगी। हमें चाहिए कि सद्विचारों को आश्रय दें और सुकर्मों को अपनाएँ।
.......................... .......................... . अखण्ड ज्योति– फरवरी, 1950

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें