बुधवार, 9 नवंबर 2016

हममें से प्रत्येक अपना कर्त्तव्य निबाहे

कार्य बहुत छोटा-सा, देखने में नगण्य-सा लगता है। पर इसका जो प्रभाव परिणाम हो सकता है, उसकी आज कल्पना कर सकना भी कठिन है। जिस विचारधारा का नव-निर्माण योजना के अंतर्गत सृजन किया जा रहा है वह अत्यन्त प्रेरक और असाधारण रूप से सामयिक प्रयोजनों को पूरा करने वाली है। इसे विचार क्राँति के लिए ही विनिर्मित किया जा रहा है। जिस स्थिति में जिस व्यक्ति द्वारा जिन भावनाओं के साथ इसे लिखा जा रहा है वह इतना प्रभावपूर्ण है कि उसे पढ़ कर कोई व्यक्ति जैसे का-तैसा नहीं बना रह सकता उसमें आवश्यक प्रेरणा एवं स्फुरणा उत्पन्न होनी ही है। अतएव दीखने में छोटा लगने वाला यह विचार-प्रचार कार्य उतना बड़ा पुण्य सिद्ध हो सकता है जिसकी तुलना में अन्य सब पुण्य तुच्छ रह जायेंगे। किसी को अन्न, वस्त्र, धन, दवा आदि की सहायता करके इतना लाभ नहीं पहुँचाया जा सकता जितना उसके विचार-स्तर को बदल कर संभव है। इसीलिए ज्ञान-दान को संसार का सबसे बड़ा दान कहा है। प्राचीन काल के साधु-ब्राह्मण इस ज्ञान-दान में निरत रहने के कारण ही भूसुर धरती के देवता कहलाते थे, और जन-साधारण के श्रद्धा-विश्वास का सम्मान प्राप्त करते थे। धर्म प्रचारक से आत्मा में प्रकाश उत्पन्न करने वाले से बढ़ कर इस धरती पर और कोई पुण्यात्मा हो भी नहीं सकता।
युग-निर्माण योजना के शत-सूत्री कार्यक्रम हैं। अनेक व्यक्तियों को अपनी-अपनी स्थिति के अनुरूप विश्व का नव-निर्माण करने के लिये अनेक प्रकार के रचनात्मक कार्यक्रम अपनाने हैं। पर ‘ज्ञान-यज्ञ’ सबका मूल है। इसके बिना क्षेत्र ही तैयार न होगा, साथी एवं सहानुभूति रखने वाले ही न मिलेंगे। इसलिये किसी को कहीं नव-निर्माण के लिए कुछ करना है तो पहल यहीं से करनी चाहिये कि इस विचारधारा से प्रभावित-सहमत-लोगों की संख्या बढ़ाई जाए। उन्हीं को साथ लेकर भविष्य में कोई रचनात्मक पद्धति आरंभ की जा सकती है।

जीवन की सार्थकता और निरर्थकता- स्वामी विवेकानन्द

अगले दिनों पूँजी नामक वस्तु किसी व्यक्ति के पास नहीं रहने वाली है । धन एवं संपत्ति का स्वामित्व सरकार एवं समाज का होना सुनिश्चित है । हर व्यक्ति अपनी रोटी महेनत करके कमाएगा और खाएगा । कोई चाहे तो इसे एक सुनिश्चित भविष्यवाणी की तरह नोट कर सकता है । अगले दिन इन सत्य को अक्षरसः सिद्ध करेंगे ।

इसलिए वर्तमान युग के विचारशील लोगों से हमारा आग्रह्पूर्वक निवेदन है कि पूँजी बढा़ने, बेटे-पोटों के लिए जायदाद इकठ्ठी करने के गोरख-धंधे में न उलझें । राजा और जमींनदारों को मीटते अपनी आँखो से देख लिया, अब इन्हीं आँखो को व्यक्तिगत पूँजी को सार्वजनिक घोषित किया जाना देखने के लिए तैयार रहना चाहिए ।

भगवान की इच्छा युग परिवर्तन की व्यवस्था बना रही है । इसमें सहायक बनना ही वर्तमान युग में जीवित प्रबुद्ध आत्माओं के लिए सबसे बडी़ दूरदर्शिता है ।

✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति, मार्च 1967
http://literature.awgp.org/hindi/akhandjyoti/1967/March/v1/
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