बुधवार, 9 नवंबर 2016

जीवन की सार्थकता और निरर्थकता- स्वामी विवेकानन्द

अगले दिनों पूँजी नामक वस्तु किसी व्यक्ति के पास नहीं रहने वाली है । धन एवं संपत्ति का स्वामित्व सरकार एवं समाज का होना सुनिश्चित है । हर व्यक्ति अपनी रोटी महेनत करके कमाएगा और खाएगा । कोई चाहे तो इसे एक सुनिश्चित भविष्यवाणी की तरह नोट कर सकता है । अगले दिन इन सत्य को अक्षरसः सिद्ध करेंगे ।

इसलिए वर्तमान युग के विचारशील लोगों से हमारा आग्रह्पूर्वक निवेदन है कि पूँजी बढा़ने, बेटे-पोटों के लिए जायदाद इकठ्ठी करने के गोरख-धंधे में न उलझें । राजा और जमींनदारों को मीटते अपनी आँखो से देख लिया, अब इन्हीं आँखो को व्यक्तिगत पूँजी को सार्वजनिक घोषित किया जाना देखने के लिए तैयार रहना चाहिए ।

भगवान की इच्छा युग परिवर्तन की व्यवस्था बना रही है । इसमें सहायक बनना ही वर्तमान युग में जीवित प्रबुद्ध आत्माओं के लिए सबसे बडी़ दूरदर्शिता है ।

✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति, मार्च 1967
http://literature.awgp.org/hindi/akhandjyoti/1967/March/v1/
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