मन बड़ा शक्तिमान् है, परन्तु है बड़ा चंचल। उसकी समस्त शक्तियाँ छ्तिरी रहती हैं और इसलिए मनुष्य सफलता को आसानी से नहीं प्राप्त करता। सफलता के दर्शन उसी समय होते हैंं, जब मन अनेक वृत्तियों को छोड़कर किसी एक वृत्ति पर केंद्रित हो जाता है, इसके अलावा और कुछ उसके आमने–सामने और आस–पास रहता ही नहीं। सब तरफ लक्ष्य–ही–लक्ष्य, उद्देश्य–ही–उद्देश्य रहता है।
जिन्हें हम विघ्न कहते हैं, वे हमारे चित्त की विभिन्न वृत्तियाँ हैं, जो अपने अनेक आकार–प्रकार धारण करके सफल नहीं होने देतीं। यदि हम लक्ष्य सिद्ध करना चाहते हैं, तो यह आवश्यक है कि लक्ष्य से विमुख करने वाली जितनी भी विचार–धाराएँ उठें और पथ–भ्रष्ट करने का प्रयत्न करें, हमें उनसे अपना संबंधविच्छेद कर लेना चाहिए और यदि हम अपनी दृढ़ता को कायम रखें, अपने आप पर विश्वास रखें तो हम ऐसा कर सकते हैं, इसमें किसी प्रकार का कोई संदेह नहीं है।
मन की अपरिमित शक्ति को जो लक्ष्य की ओर लगा देते हैं और लक्ष्य–भ्रष्ट करने वाली वृत्तियों पर अंकुश लगा लेते अथवा उनसे अपना मुँह मोड़ लेते हैं, वे ही जीवन के क्षेत्र में विजयी होते हैं, सफल होेते हैं।
.......................... ............ अखण्ड ज्योति–फरवरी, 1950

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