सोमवार, 18 मई 2015

लक्ष्‍य में तन्मय हो जाइएः––––

मन बड़ा शक्तिमान् है, परन्तु है बड़ा चंचल। उसकी समस्त शक्तियाँ छ्तिरी रहती हैं और इसलिए मनुष्य सफलता को आसानी से नहीं प्राप्त करता। सफलता के दर्शन उसी समय होते हैंं, जब मन अनेक वृत्तियों को छोड़कर किसी एक वृत्ति पर केंद्रित हो जाता है, इसके अलावा और कुछ उसके आमने–सामने और आस–पास रहता ही नहीं। सब तरफ लक्ष्‍य–ही–लक्ष्‍य, उद्देश्य–ही–उद्देश्य रहता है।



जिन्हें हम विघ्न कहते हैं, वे हमारे चित्त की विभिन्न वृत्तियाँ हैं, जो अपने अनेक आकार–प्रकार धारण करके सफल नहीं होने देतीं। यदि हम लक्ष्‍य सिद्ध करना चाहते हैं, तो यह आवश्यक है कि लक्ष्‍य से विमुख करने वाली जितनी भी विचार–धाराएँ उठें और पथ–भ्रष्ट करने का प्रयत्न करें, हमें उनसे अपना संबंधविच्छेद कर लेना चाहिए और यदि हम अपनी दृढ़ता को कायम रखें, अपने आप पर विश्वास रखें तो हम ऐसा कर सकते हैं, इसमें किसी प्रकार का कोई संदेह नहीं है।

मन की अपरिमित शक्ति को जो लक्ष्‍य की ओर लगा देते हैं और लक्ष्‍य–भ्रष्ट करने वाली वृत्तियों पर अंकुश लगा लेते अथवा उनसे अपना मुँह मोड़ लेते हैं, वे ही जीवन के क्षेत्र में विजयी होते हैं, सफल होेते हैं।
...................................... अखण्ड ज्योति–फरवरी, 1950


जीवन में सच्ची शांति के दर्शनः––


मनुष्य के अंतःस्थल में जो शुद्ध–बुद्ध–चैतन्य, सत्–चित्–आनंद, सत्य–शिव–सुन्दर, अजर–अमर सत्ता है, वही परमात्मा है। मन–बुद्धि–चित्त–अहंकार के चतुष्टय को जीव कहते हैं। यह जीव आत्मा से भिन्न भी है और अभिन्न भी। इसे द्वैत भी कह सकते हैं और अद्वैत भी। अग्नि में लकड़ी जलने से धुँआ उत्पन्न होता है। धुँए को अग्नि से अलग कहा जा सकता है, यह द्वैत है। धुँआ अग्नि के कारण उत्पन्न हुआ है, अग्नि बिना उसका कोई अस्तित्व नहीं, वह अग्नि का ही अंग है, यह अद्वैत है। आत्मा अग्नि है और जीव धुँआ है। दोनो अलग भी हैं और एक भी। उपनिषदों में इसे एक वृक्ष पर बैठे हुए दो पक्षियों की उपमा दी गई है। गीता में इन दोनों का अस्तित्व स्वीकार करते हुए एक को क्षर (नाशवान्) एक को अक्षर (अविनाशी) कहा गया है।


भ्रम से, अज्ञान से, माया से, शैतान के बहकावे से, इन दोनों की एकता पृथकता में बदल जाती है। यही दुःख का, शोक का, संताप का, क्लेश का, वेदना का कारण है। जहाँ मन और आत्मा का एकीकरण होता है, जहाँ दोनों की इच्छा, रूचि एवं कार्य–प्रणाली एक होती है, वहाँ अपार आनंद का स्रोत उमड़ता रहता है। जहाँ दोनों में विरोध होता है, जहाँ नाना प्रकार के अंतद् र्वन्द्व चलते हैं, वहाँ आत्मिक शांति के दर्शन दुर्लभ हो जाते हैं। दोनों का दृष्टिकोण एक होना चाहिए, दोनों की इच्छा रूचि एवं कार्य–प्रणाली एक होनी चाहिए, तभी जीवन में सच्ची शांति के दर्शन हो सकते हैं।
............................................ अखण्ड ज्योति– अप्रैल, 1947

जोश के साथ होशः–




संयम के बिना जीवन का विकास नहीं होता। जीवन के सितार पर हृदयलोक में मधुर संगीत उसी समय गूँजता है, जब उसके तार, नियम तथा संयम में बँधे होते हैं।


जिस घोड़े की लगाम सवार के हाथ में नहीं होती, उसपर सवारी करना खतरे से खाली नहीं है। संयम की बागडोर लगाकर ही घोड़ा निश्चित मार्ग पर चलाया जा सकता है। ठीक यही दशा मन रूपी अश्व की है। विवेक तथा संयम द्वारा इंद्रियों को अधीन करने पर ही जीवन–यात्रा आनंद पूर्वक चलती है।

उच्छृंखल युवक कभी–कभी मानसिक, सामाजिक और राष्ट्रीय बंधनों को तोड़ देना चाहते हैं। यह हमारी भूल है। जीवन में जोश के साथ होश की उसी प्रकार आवश्यकता है जैसे अर्जुन के साथ श्रीकृष्ण की। यही बुद्धि स्थिर करने का उपाय है।
.................................................. अखण्ड ज्योति– मई, 1946

बुधवार, 13 मई 2015


जिसके विचार सत्य, भाव शिव और कर्म सुन्दर हों, वही नींव बन सकता है। नीव का पत्थर मजबूती से जमा है तो समझा जाना चाहिए कि भवन भी सुन्दर ही बन रहा है।नींव बन जाना सबके बस की बात भी नहीं। अपने हाथों अपना सर्वस्व अपने लक्ष्य को समर्पित कर देना होता है... वह भी बिना किसी मूल्य वापसी की उम्मीद रखे..। अपने को खपा देना और मजबूती से जमे रहने की जिम्मेदारी ही नींव का प्राप्य है।कंगूरे का सारा सौन्दर्य भवन की नींव पर टिका रहता है। नींव हिली कि कंगूरा चूर्ण–विचूर्ण हुआ।
नींव का कोई मोल नहीं। खड़े भवन द्वारा अपना सर्वस्व देकर भी उसका मूल्य चुकाना सम्भव नहीं। देश-दुनिया को यही नींव के पत्थर सँभालते हैं और चिल्लाते कंगूरों को देखकर लोग समझते हैं कि यही सब संभाले हैं।बिना विज्ञापन किये महानतम लोग चले जाते हैं!

संघर्ष करोः––––

उठोǃ अपने चारों ओर नवजीवन के बीज बोओ, पवित्रता के वातावरण का निर्माण करो। यदि तुम दूसरों को धोखा दोगे, झूठ बोलोगे, षड्यंत्र रचोगे, ठगोगे तो इससे अपने आप को ही पतित बनाओगे अपने को ही छोटा, तुुच्छ और कमीना साबित करोगे। किसी दूसरे का अपनी सारी शक्तियाँ लगाकर भी तुम अधिक अनिष्ट नहीं कर सकते, परंतु इन हरकतों से अपना सर्वनाश जरूर कर सकते हो।

ईमानदारी पर कायम रहो और उचित साधनों से अपनी उन्नति के लिए प्रयत्न करो। अपनी ताकत को संसार के सामने प्रकट करो, क्योंकि बलवानों को ही सुखी और उन्नतिशील जीवन जीने का अधिकार है। यदि अपनी शक्ति का कोई सबूत पेश नहीं कर सकोगे, तो दुनियाँ तुम्हें एक असहाय, अनाथ, दुर्बल और अभागा समझेगी और तुम्हारे नाम के साथ ʺबेचाराʺ की उपाधि जोड़ देगी।

इसलिए मैं कहता हूँ कि संघर्ष करोǃ जीवित रहने के लिए संघर्ष करोǃǃ अपने अधिकारों को प्राप्त करने और उनकी रक्षा के लिए संघर्ष करोǃǃǃ विश्वास रखो, इस आत्मोन्नति के धर्मयुद्ध में तुम्हें वह आनंद मिलेगा, जो दुनियाँ की और किसी चीज से नहीं मिल सकता। जीवितों की भाँति जीवित रहने के चंद घंटे, मुर्दा जिंदगी के हजार वर्षों से बेहतर हैं।
..........................................अखण्ड ज्योति– फरवरी, 1945


सबके सुख में अपना सुखः––––

बाहरी दुनियाँ, भीतरी दुनियाँ का चित्र मात्र है। मनुष्य के मन में जैसी भावनाएँ घुमड़ती हैं, बाहरी परिस्थितियाँ उसी के अनुकूल स्थिर हो जाती हैं।

सच्ची शांति की स्थापना करनी हो, तो उस दूषित विचार–धारा को परास्त करना चाहिए, जो युद्धों की जननी है। पारिवारिक, सामाजिक, जातिगत, धार्मिक और राजनैतिक युद्धों का मूल कारण दूसरों के हितों की परवाह न करके अपना स्वार्थ–साधन करना है। यह नीति जहाँ भी काम कर रही होगी, वहीं कलह उत्पन्न होगी। संकीर्ण दायरे में सोचने वाले विचारक अपने देश या जाति के लाभ के लिए दूसरे देश या जाति के स्वार्थों की अवहेलना करने लगते हैं, तो उसकी प्रतिक्रिया बड़ी दुःखदायी और अशांतिकारक होती है। यह आवश्यक नहीं कि अपने को सुखी बनाने के लिए दूसरों को लूटा–खसोटा ही जाए। इस रीति से यदि कोई संपन्न बन भी जाए तो वह संपन्नता उसके लिए अंततः दुःखदायी ही होती है। समानता, एकता प्रेम, सहयोग, उदारता और बंधुत्व–भावना के आधार पर सब देशों के मनुष्य आपस में मिलजुल कर रह सकते हैं तथा एक दूसरे के सुख को बढ़ाने में सहायक हो सकते हैं।

ʺहम सुखी रहें और सब चाहे जैसे रहेंʺ यह घातक नीति अनेक विघटन उत्पन्न करती है। जब सबके सुख में जो अपना सुख तलाश किया जाता है, वही सुख वास्तविक और टिकाऊ होता है।
.............................................अखण्ड ज्योति– जून, 1945

जीने योग्य जीवन जियोः––


जियो और जीने योग्य जीवन जियो। ऐसी जिन्दगी बनाओ जिसे आदर्श और अनुकरणीय कहा जा सके। विश्व में अपने ऐसे पदचिह्न छोड़ जाओ, जिन्हें देखकर आगामी संतति अपना मार्ग ढूँढ़ सके। आपका जीवन सत्य से, प्रेम से, न्याय से, भरा हुआ होना चाहिए। दया, सहानुभूति, आत्मनिष्ठा, संयम, दृढ़ता, उदारता, आपके जीवन के अंग होने चाहिए। हमारा जीवन मनुष्यता के महान् गौरव के अनुरूप ही होना चाहिएǃ
............................................ अखण्ड ज्योति– अप्रैल, 1946


अच्छाइयाँ देखिए अच्छाइयाँ फैलेंगीः–––––––


जैसा हम देखते, सुनते या व्यवहार में लाते हैं, ठीक वैसा ही निर्माण हमारे अंतर्जगत् का होता है। जो–जो वस्तुएँ हम बाह्य जगत् में देखते हैं, हमारी अभिरूचि के अनुसार उनका प्रभाव पड़ता है। प्रत्येक अच्छी मालूम होने वाली प्रतिक्रिया से हमारे मन में एक ठीक मार्ग बनता है। क्रमशः वैसा ही करने से वह मानसिक मार्ग दृढ़ बनता जाता है। अंत में वह आदत बनकर ऐसा पक्का हो जाता है कि मनुष्य उसका क्रीतदास बना रहता है।

जो व्यक्ति अच्छाइयाँ देखने की आदत बना लेता है, उसके अंतर्जगत् का निर्माण शील, गुण, दैवी तत्वों से होता है। उसमें ईर्ष्या , द्वेष, स्वार्थ की गंध नहीं होती। सर्वत्र अच्छाइयाँ देखने से वह स्वयं शील गुणों का केंद्र बन जाता है।

अच्छाई एक प्रकार का पारस है। जिसके पास अच्छाई देखने का सद्गुण मौजूद है, वह पुरूष अपने चरित्र की प्रभा से दुराचारी को भी सदाचारी बना देता है। उस केंद्र से ऐसा विद्‍युत प्रवाह प्रसारित होता हैं, जिससे सर्वत्र सत्यता का प्रकाश फैलता है। नैतिक माधुर्य जिस स्थान पर एकीभूत हो जाता है, उसी स्थान में समझ लो कि सच्चा माधुर्य तथा आत्मिक सौंदर्य विद्‍यमान है। अच्छाई देखने की आदत सौंदर्यरक्षा एवं शीलरक्षा दोनों का समन्वय करने वाली है। यदि संसार में लोग विवेक से नीर–क्षीर अलग करने लगें और अपनी दुष्प्रवृत्तियों को निकाल दें, तो सतयुग आ सकता है।
...............................................अखण्ड ज्योति– नवम्बर, 1946

सत्कर्मों से दुर्भाग्य भी बदल सकता हैः–––


प्रारब्ध कर्मों का, भूतकाल में किए हुए भले बुरे कर्मों का फल मिलना प्रायः निश्चित ही होता है। कई बार तो ऐसा होता है कि कृतकार्य का फल तुरंत मिल जाता है, कई बार ऐसा होता है कि प्रारब्ध भोगों की प्रबलता होने के कारण विधिनिर्धारित भली–बुरी परिस्थिति वर्तमान काल में बनी रहती है और इस समय जो कार्य किए गए हैं, उनका परिणाम कभी आगे भुगतने के लिए जमा हो जाता है।

्मरण रखिए, वर्तमान ही प्रधान है। पिछले जीवन में आप भले या बुरे कैसे भी काम करते रहे हों, यदि अब अच्छे काम करते हैं तो चंद भाग्य बन गए फलों को छोड़कर अन्य संचित पाप हतवीर्य हो जाएँगे और यदि उनका कुछ परिणाम हुआ भी तो बहुत ही साधारण, स्वल्प कष्ट देने वाला एवं कीर्ति बढ़ाने वाला होगा। शिवि, दधीचि, हरिश्चंद्र, प्रह्लाद, ध्रुव, पांडव आदि को पूर्व भोगों के अनुसार कष्ट सहने पड़े, पर वे कष्ट अंततः उनकी कीर्ति को बढ़ाने वाले और आत्मलाभ कराने वाले सिद्ध हुए। सुकर्मी व्यक्तियों के बड़े–बड़े पूर्वपातक स्वल्प दुःख देकर सरल रीति से भुगत जाते हैं, पर जो वर्तमान काल में कुमार्गगामी हैं, उनके पूर्वकृत सुकर्म तो हतवीर्य हो जाएँगे। जो संचित पाप कर्म हैं, वे सिंचित होकर परिपुष्ट और पल्ल्वित होंगे, जिससे दुःखदायी पाप फलों की श्रृंखला अधिकाधिक भयंकर होती जाएगी। हमें चाहिए कि सद्विचारों को आश्रय दें और सुकर्मों को अपनाएँ।
..................................................... अखण्ड ज्योति– फरवरी, 1950

मरने से डरना क्याॽ


मरने से डरने का कारण हमारा अज्ञान है। जो परमात्मा के इस सुंदर उपवन पर स्वामित्व प्रकट करता है, उसे छोड़ना नहीं चाहता, वह अपनी मूर्खता के कारण दुःख का ही अधिकारी होगा। अपनी मृत्यु में दुःख भी इसी बात का होता है कि जीवन जैसे बहुमूल्य पदार्थ का सदुपयोग नहीं किया गया। आलस्यवश देर से स्टेशन पहुँचने पर जब रेल निकल जाती है, उस दिन नियत स्थान पर न पहुँच सकने के कारण जो भारी क्षति हुई, उसका विचार कर–करके वह आलसी मनुष्य स्टेशन पर खड़ा हुआ पछताता है और अपने आप को कोसता है। मृत्यु के समय भी ऐसा ही पश्चाताप होता है, जब मनुष्य देखता है कि मानव–जीवन जैसी बहुमूल्य संपत्ति को मैने व्यर्थ की बातों में गँवा दिया, उसका सदुपयोग नहीं किया, उससे जितना लाभ उठाना चाहिए था, वह नहीं उठाया। यदि हम जीवन के क्षणों का सदुपयोग करें, उसकी एक–एक घड़ी को केवल आत्मलाभ के, सच्चे स्वार्थ के लिए लगाएँ, तो चाहे आज चाहे कल, जब भी मृत्यु सामने आएगी, किसी प्रकार का पश्चाताप या दुःख न करना पड़ेगा।

मृत्यु से डरो मत, उससे डरने की कोई बात नहीं। डरने की बात है, हमारा गलत आचरण। कर्त्तव्य पर प्रतिक्षण सजगतापूर्वक आरूढ़ रहें, तो न हमारी, न किसी दूसरे की मृत्यु हमारे लिए कष्ट कारक होगी।
.................................................अखण्ड ज्योति– अप्रैल, 1950

Best Post

SHIV Powerful Mantra

Om namo hiranya behave ॐ नमो हिरण्यबाहवे hiranya varnaya हिरण्य वर्णाये hiranya roopaya हिरण्यरूपाये hiranya pataye हिरण्ये...