
मरने से डरने का कारण हमारा अज्ञान है। जो परमात्मा के इस सुंदर उपवन पर स्वामित्व प्रकट करता है, उसे छोड़ना नहीं चाहता, वह अपनी मूर्खता के कारण दुःख का ही अधिकारी होगा। अपनी मृत्यु में दुःख भी इसी बात का होता है कि जीवन जैसे बहुमूल्य पदार्थ का सदुपयोग नहीं किया गया। आलस्यवश देर से स्टेशन पहुँचने पर जब रेल निकल जाती है, उस दिन नियत स्थान पर न पहुँच सकने के कारण जो भारी क्षति हुई, उसका विचार कर–करके वह आलसी मनुष्य स्टेशन पर खड़ा हुआ पछताता है और अपने आप को कोसता है। मृत्यु के समय भी ऐसा ही पश्चाताप होता है, जब मनुष्य देखता है कि मानव–जीवन जैसी बहुमूल्य संपत्ति को मैने व्यर्थ की बातों में गँवा दिया, उसका सदुपयोग नहीं किया, उससे जितना लाभ उठाना चाहिए था, वह नहीं उठाया। यदि हम जीवन के क्षणों का सदुपयोग करें, उसकी एक–एक घड़ी को केवल आत्मलाभ के, सच्चे स्वार्थ के लिए लगाएँ, तो चाहे आज चाहे कल, जब भी मृत्यु सामने आएगी, किसी प्रकार का पश्चाताप या दुःख न करना पड़ेगा।
मृत्यु से डरो मत, उससे डरने की कोई बात नहीं। डरने की बात है, हमारा गलत आचरण। कर्त्तव्य पर प्रतिक्षण सजगतापूर्वक आरूढ़ रहें, तो न हमारी, न किसी दूसरे की मृत्यु हमारे लिए कष्ट कारक होगी।
.......................... .......................अखण ्ड ज्योति– अप्रैल, 1950
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