बुधवार, 13 मई 2015

सबके सुख में अपना सुखः––––

बाहरी दुनियाँ, भीतरी दुनियाँ का चित्र मात्र है। मनुष्य के मन में जैसी भावनाएँ घुमड़ती हैं, बाहरी परिस्थितियाँ उसी के अनुकूल स्थिर हो जाती हैं।

सच्ची शांति की स्थापना करनी हो, तो उस दूषित विचार–धारा को परास्त करना चाहिए, जो युद्धों की जननी है। पारिवारिक, सामाजिक, जातिगत, धार्मिक और राजनैतिक युद्धों का मूल कारण दूसरों के हितों की परवाह न करके अपना स्वार्थ–साधन करना है। यह नीति जहाँ भी काम कर रही होगी, वहीं कलह उत्पन्न होगी। संकीर्ण दायरे में सोचने वाले विचारक अपने देश या जाति के लाभ के लिए दूसरे देश या जाति के स्वार्थों की अवहेलना करने लगते हैं, तो उसकी प्रतिक्रिया बड़ी दुःखदायी और अशांतिकारक होती है। यह आवश्यक नहीं कि अपने को सुखी बनाने के लिए दूसरों को लूटा–खसोटा ही जाए। इस रीति से यदि कोई संपन्न बन भी जाए तो वह संपन्नता उसके लिए अंततः दुःखदायी ही होती है। समानता, एकता प्रेम, सहयोग, उदारता और बंधुत्व–भावना के आधार पर सब देशों के मनुष्य आपस में मिलजुल कर रह सकते हैं तथा एक दूसरे के सुख को बढ़ाने में सहायक हो सकते हैं।

ʺहम सुखी रहें और सब चाहे जैसे रहेंʺ यह घातक नीति अनेक विघटन उत्पन्न करती है। जब सबके सुख में जो अपना सुख तलाश किया जाता है, वही सुख वास्तविक और टिकाऊ होता है।
.............................................अखण्ड ज्योति– जून, 1945

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