संयम के बिना जीवन का विकास नहीं होता। जीवन के सितार पर हृदयलोक में मधुर संगीत उसी समय गूँजता है, जब उसके तार, नियम तथा संयम में बँधे होते हैं।
जिस घोड़े की लगाम सवार के हाथ में नहीं होती, उसपर सवारी करना खतरे से खाली नहीं है। संयम की बागडोर लगाकर ही घोड़ा निश्चित मार्ग पर चलाया जा सकता है। ठीक यही दशा मन रूपी अश्व की है। विवेक तथा संयम द्वारा इंद्रियों को अधीन करने पर ही जीवन–यात्रा आनंद पूर्वक चलती है।
उच्छृंखल युवक कभी–कभी मानसिक, सामाजिक और राष्ट्रीय बंधनों को तोड़ देना चाहते हैं। यह हमारी भूल है। जीवन में जोश के साथ होश की उसी प्रकार आवश्यकता है जैसे अर्जुन के साथ श्रीकृष्ण की। यही बुद्धि स्थिर करने का उपाय है।
.......................... ........................ अखण्ड ज्योति– मई, 1946

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें