मंगलवार, 7 अप्रैल 2015

"Main kya hoon" by Shir Ram Sharma Acharya

    इस संसार में जानने योग्य अनेक बातें हैं । विद्या के अनेकों सूत्र हैं, खोज के लिए, जानकारी प्राप्त करने के लिए अमित मार्ग हैं। अनेकों विज्ञान ऐसे हैं जिनकी बहुत कुछ जानकारी प्राप्त करना मनुष्य की स्वाभाविक वृत्ति है। क्यों? कैसे? कहाँ? कब? के प्रश्न हर क्षेत्र में वह फेंकता है। इस जिज्ञासा भाव के कारण ही मनुष्य अब तक इतना ज्ञान सम्पन्न और साधन सम्पन्न बना है। सचमुच ज्ञान ही जीवन का प्रकाश स्तम्भ है।

    जानकारी की अनेकों वस्तुओं में से "अपने आपकी जानकारी" सर्वोपरि है। हम बाहरी अनेक बातों को जानते हैं या जानने का प्रयत्न करते हैं पर यह भूल जाते हैं कि हम स्वयं क्या हैं? अपने आपका ज्ञान प्राप्त किए बिना जीवन का क्रम बड़ा डाँवाडोल, अनिश्चित और कंटकाकीर्ण हो जाता है। अपने वास्तविक स्वरूप की जानकारी न होने के कारण मनुष्य न सोचने लायक बातें सोचता है और न करने लायक कार्य करता है। सच्ची सुख शान्ति का राजमार्ग एक ही है और वह है-"आत्म ज्ञान"। इस पुस्तक में आत्म ज्ञान की शिक्षा है। "मैं क्या हूँ?" इस प्रश्न का उत्तर शब्दों द्वारा नहीं वरन् साधना द्वारा हृदयंगम कराने का प्रयत्न इस पुस्तक में किया गया है। यह पुस्तक अध्यात्म मार्ग के पथिकों का उपयोगी पथ प्रदर्शन करेगी, ऐसी हमें आशा है।
 कः कालः कानि मित्राणिको देशः कौ व्ययाऽऽ गमौ 
    
कश्चाहं का  मे शक्तिरितिचिन्त्यं मुहुर्मुह॥-चाणक्य नीति || ४.१८ 


            ''
कौन सा समय हैमेरे मित्र कौन हैंशत्रु कौन हैंकौन सा देश (स्थानहै,मेरी आय-व्यय क्या हैमैं कौन हूँमेरी शक्ति कितनी हैइत्यादि बातों का बराबर विचारकरते रहो'' सभी विचारकों ने ज्ञान का एक ही स्वरूप बताया हैवह है ''आत्म-बोध''अपने सम्बन्ध में पूरी जानकारी प्राप्त कर लेने के बाद कुछ जानना शेष नहीं रह जाताजीव असल में ईश्वर ही है विचारों से बँधकर वह बुरे रूप में दिखाई देता हैपरन्तु उसकेभीतर अमूल्य निधि भरी हुई है शक्ति का वह केन्द्र है और इतना है जिसकी हम कल्पनाभी नहीं कर सकते सारी कठिनाईयाँसारे दुःख इसी बात के हैं कि हम अपने को नहींजानते जब आत्म स्वरूप को समझ जाते हैंतब किसी प्रकार का कोई कष्ट नहीं रहता
 आत्म स्वरूप का अनुभव करने पर वह कहता है-
नाहं जातो जन्म मृत्यु कुतो मेनाहं प्राणः क्षुस्मिपासे कुतो मे 
नाहं चित्तं शोक मोहौ कुतो मेनाहं कर्ता बंध मोक्षौ कुतो मे॥ 
            
मैं उत्पन्न नहीं हुआ हूँफिर मेरा जन्म-मृत्यु कैसेमैं प्राण नहीं हूँफिरभूख-प्यास मुझे कैसीमैं चित्त नहीं हूँफिर मुझे शोक-मोह कैसेमैं कर्ता नहीं हूँफिरमेरा बन्ध-मोक्ष कैसे?
            
जब वह समझ जाता है कि मैं क्या हूँ तब उसे वास्तविक ज्ञान हो जाता हैऔर सब पदार्थों का रूप ठीक से देखकर उसका उचित उपयोग कर सकता है चाहे किसीदृष्टि से देखा जाय आत्मज्ञान ही सर्वसुलभ और सर्वोच्च ठहरता है
             किसी व्यक्ति से पूछा जाय कि आप कौन हैंतो वह अपने वर्णकुल,व्यवसायपद या सम्प्रदाय का परिचय देगा ब्राह्मण हूँअग्रवाल हूँबजाज हूँतहसीलदारहूँवैष्णव हूँ आदि उत्तर होंगे अधिक पूछने पर अपने निवास स्थानवंश व्यवसाय आदिका अधिकाधिक विस्तृत परिचय देगा प्रश्न के उत्तर के लिए ही यह सब वर्णन हों सोनहींउत्तर देने वाला यथार्थ में अपने को वैसा ही मानता है शरीर-भाव में मनुष्य इतनातल्लीन हो गया है कि अपने आपको वह शरीर ही समझने लगा है 
            
वंशवर्णव्यवसाय या पद शरीर का होता है शरीर मनुष्य का एक परिधान,औजार है परन्तु भ्रम और अज्ञान के कारण मनुष्य अपने आपको शरीर ही मान बैठता हैऔर शरीर के स्वार्थ तथा अपने स्वार्थ को एक कर लेता है इसी गड़बड़ी में जीवन अनेकअशान्तियोंचिन्ताओं और व्यथाओं का घर बन जाता है
 

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