सोमवार, 6 अप्रैल 2015

अपना सुधार संसार की सबसे बड़ी सेवा

विश्वव्यापी समस्त दु:खों का कारण है -अज्ञान और पाप, स्वार्थ और मोह, तृष्णा और वासना। इन महाव्याधियों को हटाए बिना दु:खों को दूर करने के समस्त प्रयत्न ऐसे हैं जैसे रक्त -विकार की फुंसियों पर मरहम लगाना। इससे व्याधि का समाधान नहीं होता। तात्कालिक कष्टों से तथा सामयिक अभावों से पीड़ित मनुष्यों की सहायता करना कर्त्तव्य है, पर उतने मात्र से न तो मानव जाति के कष्ट दूर हो सकते हैं और न समस्याएँ सुलझ सकती हैं।
धन देकर हुई सेवा सबसे साधारण मानी जाती है। उससे मनुष्यों की कुछ समस्याएँ थोड़ी देर के लिए सरल होती हैं। किसी को शरीर - सुख पहुँचाकर की हुई सेवा भी कुछ समय तक ही दु:ख दूर करती है। तन और मन की सेवा नहीं करनी चाहिए, यह प्रयोजन नहीं है, वह तो उदार हृदय व्यक्ति समय-समय पर करता ही रहेगा, उन्हें तो करनी ही चाहिए, पर किसी का जीवनक्रम जब तक न सुधरेगा तब तक इन तन और धन की सहायताओं से भी उसका काम न चलेगा। आज जो सर्वत्र अशांति, क्लेश और पीड़ा का साम्राज्य छाया हुआ है उसका कारण धन या तन के सुखों की कमी नहीं है। यह तो समयानुसार दिन-दिन बढ़ते ही जाते हैं फिर भी जो क्लेश बढ़ रहे हैं उनका कारण व्यक्ति और समाज का आंतरिक स्तर, चरित्र एवं आदर्श का गिर जाना ही है। इसे उठाने की जो सेवा है उसी से विश्वव्यापी समस्याएँ सुलझेंगी अन्यथा कुआँ बनवाने या प्याऊ लगाने से, दवाखाने और धर्मशाला बनवाने से भी क्या काम चलने वाला है। जब लोगों का चरित्र चोरी, बेईमानी, झूठ, दगाबाजी, लूट ,शोषण, अपहरण, विलासिता, फिजूलखर्ची, व्यसन, व्यभिचार आदि अनैतिक दशाओं में और तेजी से अग्रसर हो रहा है तो इन कुकृत्यों से जो दुष्परिणाम और दु:ख उत्पन्न होंगे, उन्हें देखते हुए प्याऊ लगवाने, गौ को चारा बूँद पानी डालने के समान ही होगा।
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अपना सुधार संसार की सबसे बड़ी सेवा पृष्ठ 20

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