भौतिक लाभों की प्राप्ति, कठिनाइयों की निवृत्ति के लिए भगवान से कुछ कहना, अपना ओछापन प्रकट करना है । यह अपने पुरुषार्थ भरी भुजाओं से संतुलित मस्तिष्क से माँगने की चीजें हैं । यह पारस और कल्प-वृक्ष हमारे पास हैं । उनकी सहायता से बड़ी कठिनाइयों का पार रखना और उन्नति के उच्च शिखर पर चढऩा हर किसी के लिए सम्भव है । ईश्वर के यही दो भौतिक स्वरूप हैं, जो हमारे साथ हरदम मौजूद हैं । सुख-सुविधाओं की प्राप्ति और कष्टों की निवृत्ति के लिए शारीरिक पुरुषार्थ परायणता और मानसिक दूरदर्शिता ही ऋद्धि-सिद्धि बनकर सामने आती हैं । हमें जो कुछ सांसारिक सुख एवं साधन मॉंगना हो, इन्हीं दोनों से माँगना चाहिए । भुजाएँ लक्ष्मी और मस्तिष्क नारायण के रूप में अपने साथ ही मौजूद है ।
उपासना का समय तो आत्मा में परमात्मा का भावनात्मक मिलन है । उसमें भौतिक सन्दर्भों को प्रवेश नहीं देना चाहिए ।
-पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
युग निर्माण योजना – दर्शन, स्वरूप व कार्यक्रम-६६ (१.२०)
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें