विभूतिवान लोकरंजन में नहीं सृजन में लगेंगे
साहित्यकार अगले दिनों लोकरंजन के लिए नहीं लिखेंगे । उन्हें माता सरस्वती से वेश्यावृति कराने में ग्लानि अनुभव होगी और कलम का उपयोग जनमानस को पाप पंक में धकेलते हुए उनकी आत्मा रोयेगी । आत्मग्लानि से प्रताडि़त साहित्यकार अब दिनोंदिन लोकमंगल की दिशा में बढ़ेगा । कलाकार, कवि, गायक, वादक, चित्रकार, मूर्तिकार, अभिनेता की आजीविका अब पशुता को भडक़ाकर अबोध जनमानस के साथ व्याभिचार करने की प्रवंचना नहीं रखेगी वरन् वे अपनी प्रतिभा को उसी दिशा में मोड़ेंगे जिधर मोडऩे के लिए मानवता उन्हें करूण क्रन्दन भरे स्वरों में पुकारती है । कला और साहित्य की भूमिका अगले दिनों नवनिर्माण की होगी । पिछले दिनों इस क्षेत्र में जिस प्रवंचना ने जड़ें जमाली थीं उनका अहं लोकाधिक्कार की भर्त्सनना में जल-जलकर विनष्ट ही हो जायगा ।
विज्ञान दुधारी तलवार है, उसे पैशाचिकता के लिए भी प्रयोग किया जा सकता है और समर्थ संरक्षण के लिए भी । अगले दिनों विज्ञान के सिद्धांत अध्यात्म विरोधी न रहकर समर्थक सहयोगी होंगे । साथ ही नये अविष्कारों का उदय और पुरानों का परिमार्जन इस प्रकार होगा कि वैज्ञानिकों की श्रमसाधना मानव कल्याण मे विविध पक्षों में अभिनव उपलब्धियों का प्रयोग कर सकें । आज संकीर्णतावादी राजसत्ताओं ने विज्ञान को-वैज्ञानिकों को अपने फौलादी पंजों में जकड़ रखा है और उससे करने न करने योग्य कार्य करा रहे हैं । कल ऐसा न हो सकेगा । विज्ञान को भी मुक्ति मिलेगी और वह युगान्तरकारी भूमिकाएँ सम्पन्न करेगा ।
-पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
युग निर्माण योजना – दर्शन, स्वरूप व कार्यक्रम-६६ (३.४२)
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