मंगलवार, 27 अगस्त 2013

अनीति से सतर्क रहें, अन्याय को रोकें (Be on the alert for any wrongdoings and stop injustice)

अनीति से सतर्क रहें, अन्याय को रोकें
भगवान की इस दुनिया में पुण्य और सहयोग बहुत है । वह न होता तो यहाँ  जीवित रहना असम्भव हो जाता । पर साथ ही साथ अन्याय भी कम नहीं है । यह इसलिए है कि हम सतर्क और संघर्षशील रहें । यह दोनों ही गुण मानवीय प्रगति
के लिए अति आवश्यक हैं । जो सतर्क नहीं, सावधान नहीं, लापरवाही बरतता है, वह जरूर किसी आक्रमण का शिकार होगा और घाटा उठायेगा । जो अपने बचाव और सुरक्षा का ध्यान नहीं रखता वह दुष्टता के आक्रमण का शिकार बनेगा।
प्रकृति चाहती है कि हर व्यक्ति सजग और सतर्क रहे । सावधानी बरते और घात-प्रतिघात से कैसे बचा जाता है, इस कला की जानकारी प्राप्त करे। सज्जन होना उचित है पर मूर्ख होना अक्षम्य है । हम दूसरों की सेवा-सहायता विवेकपूर्वक करें तो यह ठीक है, पर कोई मूर्ख अथवा कमजोर समझकर अपनी घात चलाये और ठग ले जाये यह अनुचित है ।
दुनिया में विश्वास के बिना काम नहीं चलता पर अविश्वासी तत्त्वों के प्रति सजगता भी अनावश्यक नहीं है। असावधानी चोरी करने के लिए प्रोत्साहन देती है । अवसर न मिले तो हर व्यक्ति ईमानदार रह सकता है पर यदि कुछ भी कर गुजरने की खुली छूट हो तो किसी का भी ललचा जाना सम्भव है । इसलिए व्यवस्था ऐसी बनानी चाहिए कि किसी को वैसी छूट न मिले जिसमें उसे ललचाने और अवांछनीय आचरण करने का अवसर मिले ।
भोलापन और भलमनसाहत बहुत ही प्रशंसनीय गुण हैं पर अति हर चीज की बुरी होती है । हमें इस सीमा तक भोला नहीं बनना चाहिए कि चारों ओर जाल बिछाकर बैठे हुए बहेलिये अपना उल्लू सीधा करने और हमें बर्बाद करने में सफल हो जायें । शत्रुओं से हमें सजग रहना चाहिए और मित्रों से सावधान।
संघर्ष के बिना कोई छुटकारा नहीं । प्रतिरोध में हानि उठानी पड़ सकती है पर प्रतिरोध न करने में – चुपचाप अनीति सहने रहने में और भी अधिक घाटे में रहना होगा । अनीति बरतने की प्रक्रिया तभी गतिशील रहती है, जब उसका अवरोध न हो । पाप को रोकना हो, अन्याय को घटाना हो तो उसके लिए समर्थ संघर्ष के लिए तत्पर होना ही पड़ेगा ।
युग निर्माण योजना – दर्शन, स्वरूप व कार्यक्रम-६६ (६.६२)

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