अनीति से सतर्क रहें, अन्याय को रोकें
भगवान की इस दुनिया में पुण्य और सहयोग बहुत है । वह न होता तो यहाँ जीवित रहना असम्भव हो जाता । पर साथ ही साथ अन्याय भी कम नहीं है । यह इसलिए है कि हम सतर्क और संघर्षशील रहें । यह दोनों ही गुण मानवीय प्रगति
के लिए अति आवश्यक हैं । जो सतर्क नहीं, सावधान नहीं, लापरवाही बरतता है, वह जरूर किसी आक्रमण का शिकार होगा और घाटा उठायेगा । जो अपने बचाव और सुरक्षा का ध्यान नहीं रखता वह दुष्टता के आक्रमण का शिकार बनेगा।
के लिए अति आवश्यक हैं । जो सतर्क नहीं, सावधान नहीं, लापरवाही बरतता है, वह जरूर किसी आक्रमण का शिकार होगा और घाटा उठायेगा । जो अपने बचाव और सुरक्षा का ध्यान नहीं रखता वह दुष्टता के आक्रमण का शिकार बनेगा।
प्रकृति चाहती है कि हर व्यक्ति सजग और सतर्क रहे । सावधानी बरते और घात-प्रतिघात से कैसे बचा जाता है, इस कला की जानकारी प्राप्त करे। सज्जन होना उचित है पर मूर्ख होना अक्षम्य है । हम दूसरों की सेवा-सहायता विवेकपूर्वक करें तो यह ठीक है, पर कोई मूर्ख अथवा कमजोर समझकर अपनी घात चलाये और ठग ले जाये यह अनुचित है ।
दुनिया में विश्वास के बिना काम नहीं चलता पर अविश्वासी तत्त्वों के प्रति सजगता भी अनावश्यक नहीं है। असावधानी चोरी करने के लिए प्रोत्साहन देती है । अवसर न मिले तो हर व्यक्ति ईमानदार रह सकता है पर यदि कुछ भी कर गुजरने की खुली छूट हो तो किसी का भी ललचा जाना सम्भव है । इसलिए व्यवस्था ऐसी बनानी चाहिए कि किसी को वैसी छूट न मिले जिसमें उसे ललचाने और अवांछनीय आचरण करने का अवसर मिले ।
भोलापन और भलमनसाहत बहुत ही प्रशंसनीय गुण हैं पर अति हर चीज की बुरी होती है । हमें इस सीमा तक भोला नहीं बनना चाहिए कि चारों ओर जाल बिछाकर बैठे हुए बहेलिये अपना उल्लू सीधा करने और हमें बर्बाद करने में सफल हो जायें । शत्रुओं से हमें सजग रहना चाहिए और मित्रों से सावधान।
संघर्ष के बिना कोई छुटकारा नहीं । प्रतिरोध में हानि उठानी पड़ सकती है पर प्रतिरोध न करने में – चुपचाप अनीति सहने रहने में और भी अधिक घाटे में रहना होगा । अनीति बरतने की प्रक्रिया तभी गतिशील रहती है, जब उसका अवरोध न हो । पाप को रोकना हो, अन्याय को घटाना हो तो उसके लिए समर्थ संघर्ष के लिए तत्पर होना ही पड़ेगा ।
युग निर्माण योजना – दर्शन, स्वरूप व कार्यक्रम-६६ (६.६२)
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